खरसिया: क्या मांड नदी का भविष्य दांव पर है? कोयला खदान की मिट्टी और खरसिया के जल संकट का बढ़ता खतरा…

खरसिया। बरगढ़ खोला के डोमनारा मांड नदी के शांत तट पर खड़े होकर यदि कोई इस दृश्य को देखे,तो पहली नजर में यह विकास की तस्वीर प्रतीत हो सकती है। लेकिन तस्वीर के पीछे छिपा सच कहीं अधिक गंभीर और चिंताजनक है। नदी किनारे छाल के ग्राम चन्द्रशेखरपुर (ऐडु) कोयला खदानों से निकली मिट्टी और ओवरबर्डन (डंप) के विशाल पहाड़ अब केवल भू-दृश्य का हिस्सा नहीं रह गए हैं, बल्कि वे मांड नदी की दिशा,दशा और अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न बनकर खड़े हैं।
जिस नदी ने दशकों से खरसिया और आस-पास के क्षेत्रों की प्यास बुझाई,खेतों को जीवन दिया और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखा,आज वही नदी अवैध खनन गतिविधियों के बढ़ते दबाव के बीच घिरती दिखाई दे रही है। तस्वीर में दिखाई दे रहे मिट्टी के पहाड़ केवल खनन अवशेष नहीं हैं, बल्कि वे भविष्य के संभावित जल संकट की मौन चेतावनी भी हैं।
नदी का स्वभाव बदलने का खतरा
जानकारों का मानना है कि जब किसी नदी के तटवर्ती क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मिट्टी और खनिज अपशिष्ट का संचयन होता है, तो वर्षा के दौरान उसका बहाव नदी में पहुंचता है। इससे नदी का तल भरता है, जलधारण क्षमता घटती है और धीरे-धीरे नदी अपना प्राकृतिक मार्ग बदलने लगती है।
मांड नदी के किनारे बढ़ते मिट्टी के पहाड़ यह आशंका पैदा कर रहे हैं कि कहीं आने वाले वर्षों में नदी का प्रवाह क्षेत्र सिकुड़ न जाए। यदि ऐसा हुआ, तो इसका सीधा असर उस जल भराव क्षेत्र पामगढ़ पर पड़ेगा जहां से खरसिया नगर की पेयजल आपूर्ति के लिए पानी संग्रहित किया जाता है।
खरसिया की प्यास पर मंडराता संकट
पामगढ़ इंटकवेल केवल एक संरचना नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की जीवनरेखा है। यदि नदी में गाद और मिट्टी का जमाव बढ़ता गया, तो जल संग्रहण क्षमता प्रभावित होगी। जल स्तर घटेगा, पंपिंग व्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा और गर्मियों में जल संकट विकराल रूप धारण कर सकता है।
यह वही खरसिया है जिसने पिछले वर्षों में जल संकट की पीड़ा झेली है। हैंडपंप सूखे, कुएं खाली हुए और लोगों को पानी के लिए संघर्ष करना पड़ा। ऐसे में यदि मांड नदी का जलग्रहण क्षेत्र प्रभावित होता है, तो भविष्य में स्थिति और भयावह हो सकती है।
विकास बनाम पर्यावरण नहीं, विकास के साथ पर्यावरण
खनन उद्योग क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है। रोजगार और राजस्व के महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं कि नदियों को मिट्टी के पहाड़ों के बीच दम घोंटने के लिए छोड़ दिया जाए।
प्रश्न यह है कि क्या खदान संचालकों द्वारा वैज्ञानिक ढंग से डंप प्रबंधन किया जा रहा है? क्या पर्यावरणीय मानकों का पालन हो रहा है? क्या मानसून से पहले मिट्टी के कटाव को रोकने के पर्याप्त उपाय किए गए हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या मांड नदी के दीर्घकालिक संरक्षण को प्राथमिकता दी जा रही है?
अब निर्णय का समय
मांड नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि खरसिया की जीवनधारा है। यदि आज इसके तटों पर खड़े मिट्टी के पहाड़ों को सामान्य दृश्य मानकर अनदेखा किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां शायद एक सिकुड़ती हुई नदी और बढ़ते जल संकट की विरासत पाएंगी।
प्रशासन,पर्यावरण विभाग,खनन कंपनियों और जनप्रतिनिधियों को तत्काल संयुक्त सर्वे कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नदी के प्रवाह, जल भराव क्षेत्र और इंटकवेल पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
क्योंकि जब नदियां अपना रास्ता बदलती हैं,तब केवल भूगोल नहीं बदलता—सभ्यताओं का भविष्य भी बदल जाता है।




