खरसियाछत्तीसगढ़

जल संकट या राजनीतिक संग्राम? खाली मटकों के साथ सड़कों पर उतरा जनाक्रोश, जिम्मेदारी किसकी?

खरसिया। चिलचिलाती धूप, सिर पर खाली मटके और आंखों में पानी की तलाश। बुधवार को खरसिया नगर की सड़कों पर यही दृश्य देखने को मिला, जब जल संकट से जूझ रहे वार्डवासी कांग्रेस के नेतृत्व में नगर पालिका कार्यालय पहुंच गए। महिलाओं, बुजुर्गों और स्थानीय नागरिकों ने नगर के विभिन्न वार्डों में पेयजल संकट, सफाई व्यवस्था और मूलभूत सुविधाओं की बदहाली को लेकर विरोध दर्ज कराया।


प्रदर्शन के दौरान महिलाओं ने आरोप लगाया कि कई मोहल्लों में कई दिनों तक नियमित जलापूर्ति नहीं हो रही है। हालात ऐसे हैं कि लोगों को दूसरे वार्डों में पानी की तलाश में भटकना पड़ रहा है। कुछ परिवार तालाब और कुओं के पानी पर निर्भर हैं, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की आशंका बढ़ गई है। सवाल यह है कि यदि पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए नागरिकों को सड़क पर उतरना पड़ रहा है, तो जिम्मेदार तंत्र आखिर किस बात का इंतजार कर रहा है?


हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष भी सामने आया है। नगर पालिका और भाजपा नेताओं का दावा है कि खरसिया इस वर्ष अभूतपूर्व प्राकृतिक जल संकट का सामना कर रहा है। भूजल स्तर ऐतिहासिक रूप से नीचे चला गया है, कई पुराने बोरवेल सूख चुके हैं और भालूनारा इंटेकवेल से जुड़ी मुख्य पाइपलाइन ओवरब्रिज निर्माण के दौरान क्षतिग्रस्त होने से समस्या और गंभीर हो गई। उनका कहना है कि सीमित संसाधनों के बावजूद पालिका के अधिकारी, कर्मचारी और जनप्रतिनिधि दिन-रात जुटे हुए हैं तथा आठ टैंकरों के माध्यम से प्रतिदिन 40 से 50 फेरे लगाकर पानी पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।


लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न राजनीति नहीं, बल्कि जवाबदेही का है। यदि जल संकट प्राकृतिक है तो क्या प्रशासन ने समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था तैयार की थी? यदि पाइपलाइन क्षतिग्रस्त होने की आशंका थी तो क्या उसका पूर्वानुमान लेकर बैकअप योजना बनाई गई थी? और यदि टैंकरों के माध्यम से जलापूर्ति हो रही है तो फिर नगर के कई वार्डों के लोग आज भी सड़कों पर क्यों हैं?

कांग्रेस ने नगर पालिका पर लापरवाही, अव्यवस्था और कथित भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। वहीं भाजपा का कहना है कि विपक्ष जनसमर्थन विहीन आंदोलन के जरिए राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है। दोनों पक्ष अपने-अपने दावे कर रहे हैं, लेकिन सबसे बड़ा सच यह है कि आम नागरिक अभी भी पानी के लिए संघर्ष कर रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम में एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने गर्मी से राहत के लिए पेयजल की व्यवस्था शुरू की है। हालांकि नागरिकों का सुझाव है कि ऐसी व्यवस्थाएं उन स्थानों पर केंद्रित हों जहां वास्तविक जरूरत अधिक है।

खरसिया का यह संकट केवल पानी का संकट नहीं, बल्कि शहरी प्रबंधन, पूर्व तैयारी और प्रशासनिक जवाबदेही की भी परीक्षा है।

जनता को राजनीतिक बयान नहीं,नलों में पानी चाहिए। नगर पालिका, जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी है कि वे आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर स्थायी समाधान प्रस्तुत करें।



क्योंकि जब नागरिक खाली मटके लेकर सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाएं, तब यह केवल विपक्ष का प्रदर्शन नहीं, बल्कि व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी होती है।

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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