रास से महारास तक कृष्ण-प्रेम की धारा में डूबे चपले क्षेत्र के रसिक,बम्हनीनडीह में डॉ.अनिरुद्धाचार्य महाराज की भागवत कथा का लिया रसास्वादन…

बम्हनीनडीह में डॉ. अनिरुद्धाचार्य महाराज से आत्मीय भेंट; गोपी भाव में कृष्ण-प्रेम की अनुभूति ने भिगोया हृदय

खरसिया/बम्हनीडीह। बम्हनीडीह में आयोजित डॉ.अनिरुद्धाचार्य महाराज की श्रीमद्भागवत कथा में इन दिनों श्रद्धा और भक्ति का सुंदर संगम देखने को मिल रहा है। कथा के विभिन्न प्रसंगों के बीच जब रासलीला का प्रसंग आया, तो कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर होकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का रसास्वादन करते नजर आए।

श्रीमद्भागवत कथा का रास प्रसंग वह आध्यात्मिक क्षण है, जहां कथा शब्दों की सीमा लांघकर अनुभूति बन जाती है। जहां श्रीकृष्ण की मुरली केवल कानों को नहीं, बल्कि अंतर्मन को पुकारती है और जहां गोपियों का प्रेम संसार की समस्त सीमाओं को पीछे छोड़कर अपने आराध्य में पूर्ण समर्पण का स्वरूप धारण करता है। रास से महारास तक की यह यात्रा वस्तुतः जीव के अपने मूल—परमात्मा—की ओर लौटने की यात्रा है।
इसी गहन भक्तिभाव में सराबोर चपले क्षेत्र के श्रीमद्भागवत कथा-रसिकों की टोली बम्हनीनडीह पहुंची, जहां उन्होंने कथावाचक डॉ. अनिरुद्धाचार्य महाराज से आत्मीय भेंट कर आशीर्वाद प्राप्त किया। संत-सान्निध्य और भागवत के भाव-सागर के बीच श्रद्धालुओं ने गोपी भाव में श्रीकृष्ण प्रेम का रसास्वादन किया।
जब भक्ति में ‘मैं’ नहीं, केवल ‘तुम’ रह जाते हो
गोपी भाव भक्ति की उस चरम अवस्था का प्रतीक है, जहां भक्त अपने लिए कुछ नहीं चाहता। न संसार की कामना, न यश की आकांक्षा और न ही किसी प्रतिफल की अपेक्षा—बस एक ही भाव शेष रहता है—‘हे कृष्ण! आप ही मेरे सर्वस्व हैं।’

गोपियों का कृष्ण के प्रति समर्पण इसी निष्काम प्रेम की अभिव्यक्ति माना जाता है। उनके लिए कृष्ण केवल आराध्य नहीं, बल्कि जीवन की धुरी थे। विरह में भी कृष्ण, मिलन में भी कृष्ण और स्मृति के प्रत्येक क्षण में कृष्ण। यही वह भाव है, जिसे भक्ति परंपरा में गोपी भाव की गहराई कहा गया है।
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बम्हनीनडीह में कथा-रसिकों का मन भी इसी भावधारा में डूबता दिखाई दिया। रास-महारास के प्रसंग ने श्रद्धालुओं के भीतर भक्ति की ऐसी तरंग जगाई, जिसमें बाहरी संसार कुछ क्षणों के लिए पीछे छूट गया और अंतर्मन में केवल श्याम की छवि, मुरली की धुन और चरणों में समर्पण का भाव रह गया।
महारास—जहां दूरी मिटती है और समर्पण पूर्ण होता है

श्रीमद्भागवत में वर्णित महारास को भक्ति परंपरा में परमात्मा के प्रति अनन्य प्रेम और आत्मसमर्पण की उच्चतम अनुभूतियों में गिना जाता है। यहां भक्त भगवान को पाने की इच्छा से आगे बढ़कर स्वयं को भगवान के प्रति अर्पित कर देता है।
महारास का मर्म देह की कथा से अधिक चेतना की कथा है। यह उस स्थिति का संकेत है जहां साधक का मन विषयों से हटकर अपने आराध्य में स्थिर होने लगता है। कृष्ण केंद्र हैं और भक्त का सम्पूर्ण भाव उन्हीं के चारों ओर समर्पित है।
इसी आध्यात्मिक मर्म को अनुभव करते हुए कथा-रसिकों ने संत-सान्निध्य में भागवत का रस ग्रहण किया। डॉ. अनिरुद्धाचार्य महाराज के साथ हुई भेंट ने इस अनुभूति को और आत्मीय बना दिया।
कथा सुनी नहीं गई,भीतर उतारी गई
भागवत कथा की सार्थकता केवल इस बात में नहीं कि कितने श्लोक सुने गए या कितने प्रसंग स्मरण रहे। उसकी सार्थकता तब है, जब कथा का एक भाव भी मनुष्य के भीतर उतरकर उसके जीवन को स्पर्श कर दे।
रास का संदेश यही है कि प्रेम अधिकार नहीं मांगता,समर्पण मांगता है। भक्ति प्रतिफल नहीं मांगती, स्वयं को अर्पित करने का साहस देती है। जब यह भाव हृदय में जागता है, तब भगवान की खोज बाहर नहीं करनी पड़ती—उनकी अनुभूति भीतर होने लगती है।
बम्हनीनडीह में चपले क्षेत्र के कथा-रसिकों की यह भेंट इसी आंतरिक यात्रा की एक भावपूर्ण कड़ी बनी। संत के सान्निध्य में श्रद्धा ने भक्ति का रूप लिया और भक्ति ने कृष्ण-प्रेम का।
रास का अंतिम पड़ाव—समर्पण
रास में श्रीकृष्ण की मुरली मन को बुलाती है, गोपियों का प्रेम उस पुकार पर स्वयं को अर्पित करता है और महारास में वही प्रेम पूर्ण समर्पण का उत्सव बन जाता है।
जब आंखों में श्याम बस जाएं तो संसार धुंधला पड़ जाता है,
जब हृदय में कृष्ण उतर जाएं तो अहंकार स्वयं उतर जाता है।
और जब भक्ति गोपी भाव तक पहुंचती है,
तो भक्त भगवान से कुछ मांगता नहीं—
बस अपने अस्तित्व का प्रत्येक कण उनके चरणों में रख देता है।

यही रास की अनुभूति है, यही महारास का मर्म और यही श्रीमद्भागवत की वह अमृतधारा है, जिसमें चपले क्षेत्र के श्रीमद्भागवत कथा के रसिकों का भी विशेष जुड़ाव रहा। गेंद लाल श्रीवास, जिन्होंने पूर्व में डाॅ अनिरुद्धाचार्य महाराज की कथा का आयोजन गृह ग्राम में कराए है साथी रसिकजन शोभा राम नायक, कृष्ण कुमार पटेल, मुकेश पटेल, दयालु पटेल, अश्वनी पटेल और होरी लाल पटेल सहित बड़ी संख्या में कथा-रसिकों ने बम्हनीनडीह में श्रद्धा और समर्पण के साथ अपने मन को डुबोया।




