दिल्ली

हिन्दी दिवस 2026 पर केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह जी का संदेश…

हिंदी दिवस के अवसर पर आप सभी को अनंत अनंत शुभकामनाएँ

दिल्ली। हमारा देश भाषाई विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि की अनुपम भूमि है। सब लोग कहते है कि हमारी भाषाएं अलग-अलग हैं वो हमारी कमी है, मगर मैं मानता हूं कि हमारी सबसे बड़ी ताकत इतनी सारी भाषाएं होना है। अपने साथ हर भाषा एक इतिहास, लोकपरंपरा और जीवन-दृष्टि को लेकर चलती है, जो हमारी नई पीढ़ी के संस्कार को भी आगे बढ़ाती है। यही भाषाई बहुलता भारत की ‘विविधता में एकता’ की भावना को सशक्त बनाती है। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं होती। वह किसी भी समाज की स्मृति होती है, उसका आत्मबोध होती है।

हिंदी ने इस विविधता के बीच संवाद, संपर्क और समन्वय की भाषा के रूप में देश के विभिन्न वर्गों और समुदायों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिंदी का विकास भी तभी सार्थक है, जब वह सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान, संरक्षण और संवर्धन के साथ आगे बढ़े। हिंदी किसी भाषा की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं के बीच आत्मीय संवाद और राष्ट्रीय एकात्मता की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इस सत्य का सबसे सुंदर प्रमाण हमारा अपना इतिहास है। स्वामी दयानंद सरस्वती जी की मातृभाषा गुजराती थी, फिर भी उन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ हिंदी में लिखा। महात्मा गांधी ने 1918 में मद्रास में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की। नेताजी सुभाष चंद्र बोस बांग्लाभाषी थे, पर उन्होंने आज़ाद हिंद फौज की सम्पर्क भाषा हिंदी को बनाया और देश को ‘जय हिंद’ का नारा दिया। यानी हिंदी को सभी लोगों ने जन-संवाद की भाषा बनाने में सबसे बड़ा योगदान दिया है। उन महापुरुषों का बहुत बड़ा योगदान हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत है, जिनकी अपनी मातृभाषा हिंदी कभी नहीं थी।

मेरी अपनी मातृभाषा भी गुजराती है, पर जब मैं देश के किसी भी कोने में जाता हूँ, तो जो भाषा मुझे वहाँ के सामान्यजन से सीधे जोड़ती है, वह हिंदी है। हिंदी की यात्रा को देखिए, तो उसमें पूरे भारत की यात्रा दिखाई देती है। आदिकाल में विद्यापति की पदावली, ‘पृथ्वीराज रासो’ की वीरगाथाएँ, फिर भक्तिकाल का वह अद्भुत युग – जब तुलसीदास जी ने रामकथा को घर-घर पहुँचाया और सूरदास जी ने वात्सल्य को स्वर दिया।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वराज, स्वदेशी और स्वभाषा के विचारों ने राष्ट्रीय चेतना को नई ऊर्जा दी और हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने भी अनुभव किया था कि स्वभाषा और स्वाभिमान के बिना स्वराज की संकल्पना अधूरी ही होती है और स्वतंत्रता के बाद भारतीय भाषाएं ही राष्ट्र निर्माण का, प्रशासन का और जन-जन तक विकास पहुँचाने का माध्यम बनीं। हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं ने जन-जागरण, राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता के विचार को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी विरासत के साथ संविधान सभा ने 14 सितंबर, 1949 को हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। पर स्वतंत्रता के बाद एक विडंबना भी पनपी। राजनीतिक स्वाधीनता तो मिली, पर स्वभाषा, स्वसंस्कृति और स्वाभिमान के विषय को हाशिये पर डाल दिया गया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले से गुलामी की इस मानसिकता से मुक्ति का आह्वान किया और इस मुक्ति में भाषा की भूमिका केन्द्रीय है। राजपथ का कर्तव्य पथ बनना केवल नामकरण नहीं था। अंग्रेजों के बनाए दंड-आधारित कानूनों की जगह जन-केन्द्रित तीन कानून बनाए – भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, यह केवल शब्दों का बदलाव नहीं था। यह आत्मगौरव की पुनर्स्थापना है।

आज नई शिक्षा नीति मातृभाषा को शिक्षा के केन्द्र में रखती है। इंजीनियरिंग और चिकित्सा की पढ़ाई भारतीय भाषाओं में हो रही है। प्रतियोगी परीक्षाएँ अनेक भारतीय भाषाओं में हो रही हैं।

इस 80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री जी ने लाल किले से विकसित भारत के लिए ‘शक्ति की सप्तधारा’ का आह्वान किया। इसकी सातवीं धारा है – भारत का सॉफ्ट पावर। किसी भी राष्ट्र के सॉफ्ट पावर का सबसे बड़ा वाहक उसकी भाषा ही होती है। योग, आयुर्वेद, साहित्य, सिनेमा, हमारी सांस्कृतिक शक्ति – ये सब दुनिया तक हमारी भाषाओं के माध्यम से ही पहुँचते हैं।

एक आशंका थी कि तकनीक के युग में भारतीय भाषाएँ कहीं पिछड़ तो नहीं जाएँगी, लेकिन मोदी सरकार में हिंदी सहित सभी भाषाएँ तकनीकी विकास का स्वर्णिम युग देख रही हैं।

राजभाषा विभाग द्वारा विकसित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-आधारित ‘भारती’ टूल आज भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को सहज बना रहा है। 8.27 लाख से अधिक प्रविष्टियों वाला ‘हिंदी शब्द सिंधु’ डिजिटल शब्दकोश ज्ञान-साझाकरण का समृद्ध माध्यम बन चुका है। 2024 में स्थापित ‘भारतीय भाषा अनुभाग’ प्रशासनिक संवाद को भारतीय भाषाओं में सुगम बना रहा है। AI और अनुवाद तकनीक ने भाषा की दीवारें गिरा दी हैं। अब कोई भी भारतीय अपनी भाषा में सोचकर पूरी दुनिया से संवाद कर सकता है। साथ ही, मोदी सरकार के कार्यकाल में संसदीय राजभाषा समिति ने अपने प्रतिवेदन के 4 नए खंड राष्ट्रपति जी को सौंपे हैं।

अंत में, युवाओं से एक बात मैं करना चाहता हूं। दुनिया की जितनी भाषाएँ सीख सकें, ज़रूर सीखें। पर अपनी भाषा को छोड़िए मत। मैं देश के सभी अभिभावकों को भी कहना चाहता हूं, अपने बच्चों के साथ अपनी मातृभाषा में बात रखने का आप आग्रह रखिए।  “मैं अपनी भाषा में बोलूँगा तो छोटा हो जाऊँगा” – इस लघुता ग्रंथि से बड़ा कोई पाप नहीं हो सकता।

भाषा ही हमें अपनी माँ से,अपनी मिट्टी से,अपने इतिहास से और अपनी संस्कृति से जोड़ती है। यह वर्ष राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की रचना का 150वां वर्ष भी है। वह गीत जिसने भाषा को स्वाधीनता का शस्त्र बना दिया था। आइए इस अवसर पर संकल्प लें कि हिंदी और सभी भारतीय भाषा को हम 2047 तक विकसित भारत बनाने की इस यात्रा का सशक्त माध्यम बनाएंगे। आप सभी को पुनः राजभाषा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं, वंदे मातरम।

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Gopal Krishna Naik

Editor in Chief Naik News Agency Group

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