शहीद नंदकुमार पटेल यूनिवर्सिटी: चपले के हिस्से का सपना ले गया रायगढ़?

खरसिया।रायगढ़ जिले की राजनीति और शिक्षा जगत में एक बार फिर वह सवाल गूंजने लगा है, जो वर्षों से खरसिया विधानसभा क्षेत्र के लोगों के मन में दबा हुआ था। शहीद नंदकुमार पटेल के नाम पर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, क्या उसका स्थायी परिसर भी उसी धरती से दूर बसाया जाएगा, जहां से उनके राजनीतिक जीवन की पहचान जुड़ी रही?
रायगढ़ में शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय के लिए 95 एकड़ भूमि चयनित होने और डीजीपीएस सर्वे की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही भवन निर्माण का रास्ता लगभग साफ माना जा रहा है। लेकिन इस प्रशासनिक प्रगति ने खरसिया क्षेत्र की उस उम्मीद को झटका दिया है, जिसमें कभी विश्वविद्यालय का स्थायी कैंपस चपले क्षेत्र में स्थापित किए जाने की चर्चाएं होती थीं।
साल 2020 में स्थापित विश्वविद्यालय आज रायगढ़, जांजगीर-चांपा, सक्ती और सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिलों के 136 महाविद्यालयों तथा 80 हजार से अधिक विद्यार्थियों का शैक्षणिक केंद्र है। छह वर्ष बीत जाने के बाद भी विश्वविद्यालय का अपना भवन नहीं बन पाया था। अब गढ़उमरिया क्षेत्र में 95 एकड़ भूमि चयनित कर प्रशासनिक भवन, शैक्षणिक संकाय, स्किल डेवलपमेंट सेंटर और आधुनिक कैंपस विकसित करने की योजना आगे बढ़ रही है।
लेकिन सवाल केवल भवन निर्माण का नहीं है। सवाल उस भावनात्मक और राजनीतिक विरासत का भी है, जिसे शहीद नंदकुमार पटेल का नाम अपने साथ लेकर चलता है। खरसिया की जनता का एक वर्ग मानता रहा है कि विश्वविद्यालय का स्थायी परिसर उस क्षेत्र में बनना चाहिए था, जहां नंदकुमार पटेल की जनसेवा और राजनीतिक संघर्ष की सबसे गहरी छाप रही।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय चपले में स्थापित होता तो शिक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय विकास, रोजगार, व्यापारिक गतिविधियों और आधारभूत सुविधाओं को भी नई गति मिलती। विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं होता, बल्कि पूरे क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक तस्वीर बदलने का माध्यम बन सकता था।
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अब जबकि भूमि चयन और सर्वे की प्रक्रिया रायगढ़ में अंतिम चरणों की ओर बढ़ रही है, यह संभावना लगभग समाप्त होती दिखाई दे रही है कि विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर खरसिया क्षेत्र में स्थापित हो सकेगा। इससे उन लोगों में निराशा देखी जा रही है जिन्होंने वर्षों तक इस मांग को अपनी उम्मीदों से जोड़कर रखा था।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण हो सकता है। आने वाले समय में यह प्रश्न उठ सकता है कि शहीद नेता के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय की भौगोलिक पहचान आखिर किस क्षेत्र से जुड़नी चाहिए थी।
फिलहाल प्रशासनिक पहिया आगे बढ़ चुका है। डीजीपीएस सर्वे के बाद भूमि आवंटन और निर्माण प्रक्रिया को गति मिलने की संभावना है। लेकिन विकास की इस नई इबारत के बीच खरसिया की स्मृतियों में एक सवाल शायद लंबे समय तक दर्ज रहेगा—क्या शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय का सपना कभी चपले की धरती पर आकार ले सकता था, या वह हमेशा सिर्फ एक सपना बनकर ही रह जाएगा?



