खरसिया का अजीब दौर: जनता सवाल करे तो जवाब कौन देगा?

खरसिया। आपके खरसिया इन दिनों एक ऐसे राजनीतिक दौर से गुजरता दिखाई दे रहा है,जहां जनता की समस्याओं की बारी आते ही जिम्मेदारी का खेल शुरू हो जाता है और सरकारी कार्यक्रमों की तस्वीर में प्रतिनिधी,छाया पद धारी,प्रशासनिक अमला,सत्ता के नुमाइंदे और छाया-चित्रों में दिखने वाले चेहरे पूरे उत्साह के साथ पहली पंक्ति में नजर आते हैं। सवाल बस इतना है—जब जनता सड़क,गड्ढे, पानी और बुनियादी सुविधाओं के लिए सड़क पर उतरती है,तब असली जवाबदेह कौन है?
हाल के दिनों में जर्जर सड़क को लेकर ग्रामीणों का आंदोलन और लगातार पांच दिनों तक चला धरना इसी सवाल को सामने लाता है। ग्रामीणजनों, विपक्ष के विधायक की मौजूदगी में त्रिपक्षीय समझौते के बाद आंदोलन स्थगित हुआ और प्रशासन ने सड़क की मरम्मत शुरू की। सवाल यह नहीं कि मरम्मत क्यों शुरू हुई; सवाल यह है कि मरम्मत के लिए जनता को धरने पर बैठना पड़ा?
इसी बीच खरसिया क्षेत्र की सड़कों की हालत को लेकर लगातार उठते सवालों ने व्यवस्था की कार्यशैली पर भी बहस छेड़ दी है।
गड्ढे में भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री पवन साय की कार फंसने की घटना ने उस समस्या को राजनीतिक गलियारों तक पहुंचा दिया, जिसे आम नागरिक लंबे समय से भुगत रहा है। खबरों के मुताबिक इस घटना के बाद प्रभारी मंत्री को भी सड़क की स्थिति को लेकर नाराजगी जताई गई। यानी जिस गड्ढे को जनता महीनों से झेल रही थी,वह जब संगठन के जिम्मेदार काफिले का पहिया नीचे आया तो उसकी गहराई शायद ज्यादा साफ दिखाई देने लगी।
विडंबना देखिए—जनता के धरना स्थल पर विपक्ष का विधायक को जनता के बीच खड़ा होना पड़ता है, जबकि सत्ता पक्ष प्रतिनिधी छाया पद के कई चेहरे सरकारी कार्यक्रमों में मंच और कैमरे के आस-पास सहज उपलब्ध रहते हैं। यह दृश्य अपने आप में खरसिया क्षेत्र के राजनीति के बदलते चरित्र पर प्रश्न चिन्ह अंकित करता है।
और जब कोई कलमकार इन सवालों को लिखने की कोशिश करता है तो बारिश भले आसमान से हो रही हो, लेकिन पसीने माथे पर दिखाई देने लगते हैं। सवाल पूछना पत्रकारिता का धर्म है, मगर सवाल सत्ताधारी दल से हो तो माहौल अचानक असहज क्यों हो जाता है? क्या लोकतंत्र में सत्तारूढ़ से सवाल पूछना इतना कठिन हो गया है कि कलम को भी मौसम देखकर चलना पड़े?
जनता सब देख रही है। किस समस्या पर कौन पहुंचा,किसने आवाज उठाई, किसने आश्वासन दिया और किसने जमीन पर काम कराया—इन सबका हिसाब किसी प्रेस विज्ञप्ति में नहीं, बल्कि जनता की स्मृति में दर्ज होता है।
खरसिया की जागरूक जनता को शायद अब भाषण नहीं, जवाब चाहिए; तस्वीर नहीं,परिणाम चाहिए; आश्वासन नहीं,सड़क चाहिए। सरकारी कार्यक्रमों की भीड़ और धरना स्थलों की खाली मंच के बीच का यह फर्क जितना बड़ा होगा,राजनीतिक सवाल भी उतने ही तीखे होते जाएंगे।
आखिर यह पब्लिक है,पब्लिक—सब जानती है।
और लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज जनता का शोर नहीं,उसकी खामोश होती हुई स्मृति है,जो चुनाव के समय बोलती है।



