“कागजों में विकास,जमीन पर बदहाली: रतन महका के ग्रामीणों का ‘ज्ञापन युग’ जारी”

✍️संतोष यादव @खरसिया।ग्राम पंचायत रतन महका में विकास कार्यों की स्थिति इन दिनों ऐसी है कि अगर “काम” को ढूंढने निकलें,तो शायद वह भी किसी फाइल में आराम करता मिल जाए। गांव के लोग लगातार ज्ञापन दे रहे हैं, और पंचायत व्यवस्था उतनी ही लगातार उसे ‘अनसुना’ करने की कला में दक्ष होती जा रही है।
क्या कहते हैं?
ग्रामीणों का आरोप सीधा और स्पष्ट है—पेंशन योजनाओं के पात्र हितग्राहियों से दस्तावेज तो ले लिए गए,लेकिन उन्हें आगे भेजने की ज़रूरत शायद महसूस नहीं हुई। परिणाम यह कि पात्र लोग योजनाओं के लाभ से वंचित हैं।

दूसरी तरफ,डेढ़ महीने से खराब पड़ा शासकीय बोर यह बताने के लिए पर्याप्त है कि पानी की समस्या भी अब ‘स्थायी’ श्रेणी में आ चुकी है।
शिकायतों का इतिहास,समाधान का अभाव

यह कोई पहली शिकायत नहीं है। इससे पहले भी ग्रामीण साफ-सफाई, नालियों की स्थिति और स्ट्रीट लाइट जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर ज्ञापन सौंप चुके हैं।
नालियां जाम हैं, कचरे के ढेर हैं, मच्छर-मक्खियों का साम्राज्य है—और इन सबके बीच पंचायत की सक्रियता उतनी ही दिखाई देती है जितनी रात में बिना लाइट के रास्ता।
लगता है पंचायत ने विकास की परिभाषा को थोड़ा ‘आध्यात्मिक’ बना लिया है—जो दिखे नहीं,वही सच्चा विकास।

पेंशन हो या पानी, दोनों शायद “प्रक्रिया में” हैं—और यह प्रक्रिया इतनी लंबी है कि गांव वाले अब उसे स्थायी व्यवस्था मानने लगे हैं।
समस्या सिर्फ लापरवाही नहीं,व्यवस्था का संकेत
यह मामला केवल एक ग्राम पंचायत तक सीमित नहीं दिखता।
• योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचना
• बुनियादी सुविधाओं का अभाव
• शिकायतों पर कार्यवाही का अभाव
ये संकेत हैं कि स्थानीय प्रशासनिक जवाबदेही कहीं न कहीं कमजोर हो रही है।
जब बार-बार ज्ञापन देने के बाद भी स्थिति जस की तस रहती है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सिस्टम की सुस्ती का प्रतीक बन जाता है।

रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर
• बुजुर्ग और जरूरतमंद पेंशन से वंचित
• गर्मी में पानी के लिए भटकते लोग
• गंदगी से स्वास्थ्य जोखिम
• अंधेरे में आवागमन की परेशानी
खरसिया जनपद पंचायत क्षेत्र में विकास की कमी यहां आंकड़ों में नहीं,बल्कि लोगों की दिनचर्या में साफ दिखाई दे रही है।
अब सवाल यह है कि क्या यह ज्ञापन भी पहले वाले ज्ञापनों की तरह फाइलों में “सम्मानजनक स्थान” प्राप्त करेगा,या फिर प्रशासन वास्तव में हस्तक्षेप करेगा।
यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो यह मुद्दा केवल ग्राम स्तर से निकलकर व्यापक प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल बन सकता है।
रतन महका के ग्रामीण अब विकास नहीं, सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनकी समस्याएं “नोट” ही नहीं, “सुलझाई” भी जाएं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं.लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति thedehati.com उत्तरदायी नहीं है।)



