मांड नहर का सौंदर्यीकरण: विकास की चमक या मिट्टी की परतों में छिपी कहानी?

खरसिया।सरकारी फाइलों में मांड नहर का सौंदर्यीकरण शायद विकास का एक शानदार अध्याय होगा। लाखों-करोड़ों रुपये खर्च हुए, योजनाएं बनीं, प्रगति रिपोर्टें तैयार हुईं और कागज़ों पर सब कुछ इतना सुंदर दिखा कि मानो रेगिस्तान में गंगा बह निकली हो।
लेकिन यदि आप एनएच-49 के नज़दीक सेन्द्रीपाली-कनमुरा के मध्य इस नहर तक पहुंच जाएं, तो तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती दिखाई देती है। हूजूर,आपकी किस्मत अच्छी होनी चाहिए, क्योंकि अगर बारिश का पानी भर गया तो यह “सौंदर्यीकरण” आंखों से ओझल हो जाएगा। फिलहाल पानी नहीं गिरा है, इसलिए मिट्टी की लिपापोती,उखड़ती सतहें और अधूरी तस्वीर खुलकर सामने खड़ी है।
नहर मानो मौन होकर पूछ रही हो—”क्या मुझे संवारा गया है, या सिर्फ सजाने का अभिनय किया गया है?” दूर से देखने पर सब कुछ व्यवस्थित प्रतीत होता है, लेकिन नज़दीक जाकर लगता है कि विकास की चमक पर जल्दबाज़ी की धूल जम गई है।
विडंबना यह है कि जिन परियोजनाओं का उद्देश्य वर्षों तक किसानों और ग्रामीणों को लाभ पहुंचाना होता है, उनकी गुणवत्ता का सच पहली ही बारिश के भरोसे छोड़ दिया जाता है। यदि बरसात ने सवाल नहीं पूछे, तो सब ‘चकाचक’ है। और अगर पानी ने अपनी राह खोज ली, तो जवाब देने के लिए शायद फिर कोई नई योजना, नया सर्वे और नया बजट तैयार होगा।

मांड नहर की यह तस्वीर केवल एक नहर की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना भी है जहां कभी-कभी सौंदर्यीकरण का अर्थ स्थायित्व से अधिक प्रदर्शन बन जाता है। काश, मिट्टी की इस परत के नीचे जवाबदेही की भी कोई मजबूत नींव दिखाई देती।
“विकास का रंग इतना गाढ़ा पोता गया है कि पहली बारिश के आने से पहले ही दरारें बोलने लगी हैं; अब इंतजार सिर्फ बादलों का नहीं, सच के बहकर सामने आने का भी है।”




